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श्रीमद् भगवद गीता – अध्याय – २ – अतुल वर्मा

शांख्य योग

दूसरे अध्याय में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को बताते है की कैसे आशंका, हताशा, डर मन को कमजोर करने वाले होते है और इसकी वजह से अगर हम कर्म ना करें तो ये ठीक नहीं है। हमें अपने धर्म के अनुसार कर्म करना चाहिए। भविष्य में क्या होगा किसी को नहीं पता। पर आज हमें क्या करना है वो निर्णय हम कर सकते है।

जब बात आती अपने लोगों को मारने की तो भगवान कहते है किसी बात शोक नही करना चाहिए, जो है उनके लिए भी जो नहीं है उनके लिए भी। ये जीवन चक्र चलता रहता है। केवल आत्मा ही सत्य है शरीर जन्म लेता और खत्म हो जाता। आत्मा सिर्फ़ शरीर बदलती पर वो अजर अमर है और ये परिवर्तन प्रकृति का नियम है। सुख दुःख, सर्दी गर्मी सब इंद्रियों से जुड़ी हुई बातें है, जो आज है कल नहीं है। इसलिए सुख और दुःख दोनो से परे रहना चाहिए, क्यों की ये तो आने जाने है।  इनके लिए दुःख करने की आवश्यकता नहीं है। हमें समभाव से दोनों ही परिस्थिति में रहना चाहिए।

हमारी इंद्रियां हमें इस संसार से जोड़ती हैं। और जो कुछ कुछ भी हम इन इन्द्रियों से अनुभव करते है उसी को सत्य मान लेते है। हमारे भाव (emotions) जीवित और मृत होते रहते है। आज हम खुश है कल हम दुखी है। पर एक जो चीज नहीं बदलती वो है आत्मा। तो जो रिश्ते, नाते, भाव आस्थायी है उनसे मोह कैसा, वो आज है कल फिर होंगे। पर अगर हम धर्म के अनुसार अपना कर्म नहीं करेंगे तो पाप के भागी बनेंगे। जब आप धर्म के लिए कुछ कर रहे है तो जय पराजय का कोई मतलब नहीं बनता। आप अपना सब कुछ अपने कर्म में लगा दे बिना फल की चिंता किए। फिर आप सफल होते है या असफल होते है कोई फर्क नहीं पड़ता, आपको निराशा का सामना नहीं करना पड़ेगा 

आगे भगवान श्री कृष्ण कहते है की ज्ञान से आप सब कुछ समझ सकते है पर कर्म योग व्यावहारिक है दोनों तरीके आपको एक जगह ही ले जाते है। सबके लिए ज्ञान योग सम्भव नहीं है, कर्म योग सबके लिए सम्भव है। कर्म योगी की बुद्धि निश्त्यमक होती है। जब निर्णय नहीं ले पाते है तब हमारी बुद्धि चारों तरफ घूमती रहती है। 

कर्मों के फल के के लिए कर्म नहीं करना उचित नहीं है। कर्म के फल की इच्छा मत करो पर कर्म करने की इच्छा मत त्यागो। इसे ही निष्काम कर्म कहते है। जब फल के बारे में हम सोचते है तो हम डरते है और  असफलता हमें डराती हैं और हम अपना कर्म ठीक से नही कर पाते है। 

आम इंसान फल के बारे में सोचता है आपका ध्यान फल पर रहता है, और कर्म से ध्यान हट जाता है। फल का मोह उसे फँसाता है। जब हम धन से, रिश्तों से, मोह करते है तो पाप के भागी होते हैं। ये बुरे नही है बस उनका मोह ग़लत होता है। क्योंकि ये सोचने की शक्ति को कम करते है, जिससे निर्णय गलत हो जाते है। अर्जुन के पूछने पर भगवान श्री कृष्ण निष्काम एकाग्र व्यक्ति के आचरण के बारे में बताते हैं 

  1. कर्मयोगी अपनी ख़ुशी के लिए इंद्रियों पर आश्रित नही होता उसकी ख़ुशी आंतरिक होती है, उसकी इंद्रियां उसके वश में होती है।  
  2. ऐसे लोग दुख सुख में एक जैसे रहते है जिनकी बुद्धि स्थिर होती है वो पुरुष इंद्रियों से प्राप्त होने वाली खुशी से अपने को से हटा देते है और दुनिया की चीजें उनको लुभा नहीं पाती और वो स्थिर हो जाते है। सब कुछ छोड़ के दुनिया से दूर चले जाना एकाग्रता नहीं है, अगर आपका मन सांसारिक वस्तुओं में ही लगा रहता तो आप योगी नही है। आपको अपना मोह दुनिया में रहते हुए ही ख़त्म  करना चाहिए। अगर हमारी आसक्ति इंद्रियों से ख़त्म नहीं होती तो हम उनके अधीन आ जाते है। और अपने कर्म पर ध्यान नहीं लगा पाते।भगवान कहते है इच्छाओं से कामना की उत्पत्ति होती है, कामना नहीं पूरी होती तो क्रोध उत्पन्न होता है, और क्रोध में हम अपनी समझ खो देते है, समझ ना पाने की वजह से, बुद्धि का नाश हो जाता है और हम सही निर्णय नहीं ले पाते जो लोग आसक्तियों को नियंत्रण में रखते है वो आंतरिक रूप से प्रसन्न रहते है। जो पुरुष अपने मन को जीत नहीं पाते वो निश्चयात्मक बुद्धि को प्राप्त नहीं कर पाते और परेशान रहते है।
  3. जैसे जल में चलने वाली नाव का रुख़ हवा बदल देती वैसे ही इंद्रियों के वश में होने से आप कुछ नहीं सोच पाते और आपकी सोच आपकी इंद्रियों के साथ साथ चलती है। योगी पुरुष इंद्रियों को जीत लेते है तो और कुछ भी कर सकते है। भगवान कहते है की बुद्धि सहारा लेती है हमारी इंद्रियों का, अगर बुद्धि को नियंत्रित करना है तो इंद्रियों को नियंत्रित करना पड़ेगा 
  4. जैसे समुद्र में सारी नदियों  बिना समुद्र को विचलित किए हुए उसमें समा जाती है योगी मनुष्य को भी वैसा होना चाहिए, जिसमें सारे सुख दुःख समा जाएँ बिना किसी हलचल के। जो कामनाओं का त्याग करता है वह मोक्ष को प्राप्त होता है, जो दुनिया में रह कर भी दुनिया से अलग रहता वही सफल होता है।

मनोविज्ञान

हम सारे लोग अपने जीवन में किसी ना किसी समस्या से घिरे रहते है और परेशान रहते है हम सब में एक अर्जुन रहता है और आम सब में भगवान कृष्ण का भी वास है। पर हम कभी कभी वास्तविकता नहीं देख पाते हमारे अंदर का अर्जुन हमें नही देखने देता वास्तविकता और कोई हमारे जीवन में आता है और भगवान श्री कृष्ण की तरह वास्तविकता देखता और कभी कभी हमें खुद अपने अंदर के कृष्णा को देखना होता है  जो हमारे अंदर के अर्जुन का मार्गदर्शन करता है। 

अगर हम सोचे हम क्यों परेशान रहते है तो वजह है हमारा मोह जो सांसारिक चीजों से है, चाहे वो हमारा घर हो या हमारा रिश्ता हो या अन्य सांसारिक वस्तु। हम ये मान लेते है की यही हमारी पहचान है जबकि ये सब अस्थायी है ये बदलेंगे, चाहे सुख हो या दुख, चाहे जय हो पराजय, चाहे प्रेम हो द्वेष और चाहे ये आपका शरीर ही क्यों ना हो। तो अगर आप उनसे मिलने से खुश हो जाते है तो उसके जाने से दुखी हो जाएंगे और ये चक्र चलता रहेगा।

भगवान श्री कृष्ण ने कहा ये सुख दुःख इंद्रियों के विषय है। हमारी बुद्धि संसार को समझने के लिए इंद्रियों का उपयोग करती है, और इन्द्रियाँ हमें भ्रमित भी कर देती है हम इन्द्रियों से प्राप्त अनुभवों को सत्य समझ लेते है और आत्मा की सत्यता भूल जाते है। इन्द्रियाँ हम में इच्छा जागृत करती है, इच्छा पूर्ण ना होने पर हम क्रोधित हो जाते है, क्रोध में हमारी सोचने समझने की शक्ति खत्म हो जाती है उसी को वेस्टर्न सायकॉलजी में frustration aggression hypothesis कहते है। 

अब इसको ठीक कैसे करें, जिससे हमें पता है की बुद्धि इंद्रियों का उपयोग करती है, तो अगर हम इंद्रियों को अपने वश में करेंगे तो हमारी बुद्धि ठीक तरीके से काम करेगी हम सही निर्णय ले पाएँगे। 

अपने डर जो कर्म के फल से संबंधित है उस से भी हम निकाल सकते है, जब हम अपना ध्यान फल पर केंद्रित करते है तो कर्म से हमारा ध्यान हट जाता है और निष्काम कर्म नहीं करते और और वो हमारे दुःख का कारण बनता है। अगर हम अपना सारा कुछ अपने कर्म में झोंक दे बिना फल की चिंता है जिसपे हमारा ना तो कोई नियंत्रण है ना ही अधिकार तो जीवन के दुःख से बाहर आ जाएंगे और सफलता भी मिलेगी। 

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