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श्रीमद् भगवद गीता – अध्याय – 3 – अतुल वर्मा

कर्मयोग

अर्जुन भगवान कृष्ण से कहते है की भगवान आप मुझे ज्ञान की बातें बता रहे है और साथ में ही आप मुझे कर्म करने की बात भी कर रहे है यदि ज्ञान से सब कुछ प्राप्त हो सकता तो आप मुझे युद्ध में क्यों करने को कह रहे है। अर्जुन सांख्य योग और कर्मयोग में उलझने लगते है। 

भगवान कृष्ण सांख्य योग और कर्मयोग के बारे में अर्जुन को बताते है और उनकी उलझन दूर करते है और कहते है दो तरह के लोग होते है। एक वो लोग जो आध्यात्मिक होते और सांख्य योग (knowledge and contemplation) का सहारा लेते जीवन को समझने के लिए, दूसरे वो लोग जो कर्म योगी होते और कर्म (action ) का सहारा लेते जीवन को समझने के लिए। दोनों में से कोई भी मार्ग व्यक्ति अपनी प्रकृति के हिसाब से चुन सकता है। 

आगे भगवान कृष्ण कहते है की ज्ञान बिना कर्म के व्यर्थ है और कर्म बिना ज्ञान के। ज्ञान और कर्म दोनों ही सांख्य योग और कर्मयोग में जरूरी है, अंतर सिर्फ़ इनके अनुपात का है। 

भगवान कहते है की अपने कर्मों का त्याग कर देने से आपको कर्म बंधन से मुक्ति नहीं मिलती, अगर आपके मन में अभी भी सांसारिक मोह, कर्म फल के विचार चलते रहते है आपको उन पर कार्य करना पड़ेगा क्योंकि एक कर्मयोगी को ये ज्ञान ही निष्काम कर्म ही उसे कर्म बंधन से मुक्त करेगा जानना ज़रूरी है। ये ज्ञान ही कर्म योगी को सफल बनाता है। 

इसी तरह सांख्य योगी अगर सांसारिक जीवन त्याग कर दे और उसके मन में सांसारिक मोह और कर्म फल की बातें ही चलती रहे तो ऐसा ज्ञान आपको मुक्त नहीं करता। तो ये समझना की सांख्य योग की सफलता के लिए कर्म करने की आवश्यकता होती है। 

भगवान कहते है की कोई भी बिना कर्म के एक क्षण भी नहीं रह सकता, क्योंकि उठना बैठना बैठना सांस लेना, सोना सब एक कर्म है। हम सब अपने गुणों सत्व, रजस और तमस ((sattva, rajas, and tamas)  के अनुसार कर्म करने के लिए बाधित है। 

कर्म को यज्ञ (त्याग) की तरह करना चाहिए अपने कर्म ईश्वर को अर्पित करने चाहिए इस से कर्म बंधन नहीं होता है अर्थ ये हुआ हमें कर्म फल की आशा नहीं करनी चाहिए। कर्म बंधन को ऐसे समझ सकते है की मान लेते है कर्म एक बंदूक है चोर उसे चोरी करने के लिए इस्तेमाल करता है और पुलिस उसको रक्षा करने के लिए। बंदूक अपने आप में बुरी या अच्छी नहीं है। उसी तरह कर्म अच्छे या बुरे नहीं होते बल्कि आपके मन की स्थिति पर निर्भर करता है कर्म आपको ऊपर उठता है या बंधन में डालते है। कर्म जो इंद्रियों को सुख देने के लिए किए जाते है वो बांधते है। और ये भी सच है कर्म तो करना पड़ेगा बिना कर्म के कोई नही रह सकता। किस तरह का काम आप करेंगे आप के ऊपर निर्भर करता है। 

भगवान कहते है की ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की और कहा कि सारे लोग यज्ञ करें और उन्नति प्राप्त करें। यह ये तात्पर्य है की आप जो भी करें ईश्वर को अर्पित करें, अगर आप कर्म नहीं करते हैं और केवल फल प्राप्त करते है तो यह एक चोरी की तरह है। 

जन्म लेना ज़िंदा रहना और मर जाना जीवन नही है ये सभी प्राणी करते है। हम ही ऐसे प्राणी है इस जगत में जो निर्णय ले सकते और अपने विकल्पों की चुन सकते है।

वो लोग जिन्होंने ईश्वर को प्राप्त कर लिया है उनके के लिए कोई कर्म नहीं होता उनके के लिए कोई नियम नहीं होता पर ऐसे श्रेष्ठ पुरुषों को कर्म करना चाहिए क्योंकि ऐसे लोग दूसरे लोगों प्रेरित करते है और लोग उनका अनुसरण करते है, अगर वो कर्म नहीं करेंगे तो समाज में गलत संदेश जाएगा। भगवान कहते है मुझे कोई कर्म करने की ज़रूरत नहीं है पर मैं भी कर्म करता हूँ, अगर आप मनुष्य रूप में जन्मे है तो कर्म करना पड़ेगा। 

हर इंसान अपनी प्रकृति के अनुसार काम करता है पर कुछ अज्ञानी लोगों को लगता है की वो कर्म कर रहे हैं पर ये सत्य नाहि नहीं है लोग से उनके गुण कर्म करवाते है, अपने गुणों के अनुसार ही लोग काम करते चाहे वो ज्ञानी पुरुष हो या अज्ञानी। बस फ़र्क़ इतना होता है ज्ञानी अपने कर्मों को ईश्वर को अर्पित कर देता है और अज्ञानी अपने कर्मों को इंद्रिय सुख के लिए अर्पित करता है। 

गुणों को बताते हुए भगवान कहते है, सात्विक, राजसिक और तामसिक गुण होते है, हमें अपने गुणों के अनुसार कार्य करने चाहिए, दूसरे के धर्म के अनुसार कार्य करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए क्यों की वो हमारा धर्म नहीं है और जो हमारा धर्म नहीं हैं और हमारे गुणों के अनुसार नही है वो हमारे लिए उचित नहीं है और हमें वो ईश्वर के मार्ग पर नहीं ले जा पाएगा। हमें अपने धर्म का ही पालन करना चाहिए चाहे फिर उसपे आपको अपनी जान भी देनी पड़े। 

अर्जुन भगवान से पूछते है जब सब कुछ जानते हुए भी व्यक्ति अधर्म के रास्ते पर क्यों चलता है, भगवान कहते है जब व्यक्ति में रजोगुण से काम, क्रोध, राग, द्वेष उत्पन्न होते और  ये सब हमारे अंदर के आत्मा रूपी ज्ञान को छिपा देते हैं और लोग अधर्म की ओर जाते है। 

भगवान कहते है शरीर से बेहतर इंद्रियां है, इंद्रियों से बेहतर मन है, मन से बेहतर बुद्धि और  बुद्धि से बेहतर आत्मा हैं। 

भगवान कहते है इंद्रिय, मन और बुद्धि इच्छाओं के पनपने के लिए बहुत ही उर्वरक जगह है जहां ये फलते और फूलते है। तो इसलिए पहले ही अपनी इंद्रियों को वश में करके इन पर विजय करो यही है जो आपके आत्मज्ञान को छुपा देती है और आत्म ज्ञान को प्राप्त करो। 

मनोविज्ञान

व्यावहारिक ज्ञान (Practical Skills) – कर्मयोग और ज्ञान योग के विषय में कहा गया है की अगर आप अपने ज्ञान को कर्म करने में इस्तेमाल नहीं करते है तो ऐसा ज्ञान व्यर्थ है और अगर बिना ज्ञान के के कर्म करते है तो वो भी व्यर्थ है।  

व्यक्तित्व और करियर गाइडेंस (Personality and Career Guidance) – आपका व्यवहार आपके व्यक्तित्व के अनुसार होता और और आपको अपने गुणों के अनुसार अपने कार्यों को चुनना चाहिए। 

निःस्वार्थता, निर्णय लेने की क्षमता और आत्मज्ञान – (Selflessness,  Ability to Decision and Real Self) – मनुष्य और प्राणियों से उच्च है बाक़ी प्राणियों की तरह अगर वह सिर्फ अपना पेट भरने अपने सुख के साधन जुटाने में लगा रहेगा तो वह अपने उद्देश्य से भटक जाएगा, मनुष्य निर्णय ले सकता है और उच्चतर उद्देश्य के लिए काम कर सकता है और आत्म ज्ञान को प्राप्त कर सकता है। 

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