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श्रीमद् भगवद गीता – अध्याय – ४ – अतुल वर्मा

ज्ञान कर्म और सन्यास योग 

भगवान इस अध्याय में अर्जुन से कहते है जो ज्ञान मैंने सूर्य को दिया था और सूर्य से वो ज्ञान औरों तक पहुँचा वही ज्ञान मैं तुमको आज बता रहा हूँ। और भगवान ने बोला की ये ज्ञान सिर्फ़ उन्ही के लिए है जो इसके के लिए प्रयत्न करते है और उत्सुक है। 

भगवान कहते ईश्वर अजन्मा है अनंत है, लेकिन धर्म को स्थापित करने के लिए वो योग माया से वो जन्म लेते है और उनको कोई भी सांसारिक कर्म बांध नही सकता। जो व्यक्ति इस बात को समझ लेता है तो वो ईश्वर को प्राप्त कर लेता है। 

फिर भगवान अर्जुन को कर्म के बारे में बताते है की कर्म तीन तरह के होते है कर्म, अकर्म और विकर्म। कर्म वो कार्य है जो हमारे शास्त्रों में बताए गए है और जो इंद्रियों और मन को शुद्ध करने वाले होते है।अकर्म वो कार्य है जो बिना किसी आसक्ति के और बिना कर्म फल की आशा के ईश्वर के लिए किए जाते है, और उनसे कोई कर्म बंधन नही होता है। विकर्म वो कर्म है जो शास्त्रों में माना किए गए है और जो आपकी आत्मा को पतन की ओर ले जाते हैं। 

कर्म जो ईश्वर को समर्पित होते है, व्यक्ति उससे उत्पन्न फल से बंधा नहीं होता और उस कर्म रूपी यज्ञ से जो अमृत बचता है योगी उसका सेवन करता है, जिससे उसकी सारी अशुद्धियाँ धूल जाती है। इस अनंत ज्ञान की प्राप्ति से कोई भी सांसारिक दुखों को पार  कर सकता है। भगवान कहते है इस ज्ञान के लिए आपको एक ऐसा गुरु चाहिए जो खुद ईश्वर को प्राप्त कर चुका हो उस से ही आपको ज्ञान लेना चाहिए। 

मनोविज्ञान 

उत्सुकता जानने की /Motivation 

आप कोई भी काउन्सलिंग उसी व्यक्ति को दे सकते है जो काउंसलिंग लेना चाहता है। जैसे अर्जुन योग्य पात्र थे भगवान से ज्ञान प्राप्त करने के लिए। क्योंकि वह उसकी उपयोगिता समझेगा और उस ज्ञान के आधार पर कर्म करेगा। 

प्रकृति / Nature 

भगवान ने बोला है अगर कोई व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है तो तो सांसारिक दुखों से निकल सकता है। चाहे वो फिर कैसा भी व्यक्ति क्यों ना हो। क्योंकि हम सभी उसी परमात्मा का हिस्सा है और इंद्रियों, मन और  बुद्धि की वजह से आत्मा से दूर हो जाते है। और अज्ञान को हटाने से हम अपने वास्तविक रूप (realself) को पहचान सकते है। जो हमें एक आशा प्रदान करता है। 

कार्य / ज्ञान  / Behaviour/ Cognition    

हमारे कार्य (behaviour) ही हमारे बारे में बताते है की हम किस तरह से अपना जीवन जिएंगे। अगर हमारे कर्म सही होंगे तो हमारा जीवन भी। पर साथ ही साथ हम क्या कर्म कर रहे है और हमें कर्म कैसे करना चाहिए जिससे हमारे विचार(cognition) भी शुद्ध हो ये भी ज़रूरी है। 

परामर्शदाता / Counsellor  

गीता में गुरु का वर्णन ऐसे है की आपको भी उसी आचरण का पालन करना है जो आप दूसरों को बता रहें है करने के लिए। तो आपको भी अपने ऊपर भी उतना काम करना है जितना आप दूसरों (शिष्य) को करने को कहते है तभी आप एक अच्छे counsellor (गुरु)।

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