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श्रीमद् भगवद गीता – अध्याय – १ – अतुल वर्मा

अर्जुन विषाद योग

श्रीमद् भगवद गीता के पहले अध्याय में जिसको हम अर्जुन विषाद योग बोलते है आज हम उसकी बात करेंगे। मनोवैज्ञानिक होने के नाते मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी देखेंगे। इस अध्याय पर अर्जुन कहते है कि मैं कैसे लड़ाई करूँ ये तो सब अपने लोग है इनको मारने का मतलब खुद के परिवार को खत्म करना है। अर्जुन कहते है इन सब लोगों ने मुझे बड़ा किया है ये सब मेरे भाई बंधु है। अर्जुन को बहुत ऐंज़ाइयटी होना शुरू हो जाती उनके हाथ पैर सब कांपने लगते है वो रोने लगते है और बोलते है की मुझसे से नहीं होगा मैं इस राजपाट का क्या करूँगा सब को मार के मिल भी गया तो। 

अब अगर आप खुद को अर्जुन की जगह रखे तो आप समझ पाओगे की भगवान कृष्ण क्या कह रहे है । इसको ऐसे समझते हैं कि आप हम जीवन के कुरुक्षेत्र में खड़े है ऐसी बहुत सारी परिस्थितियां होती है जहां हम अर्जुन होते है और हमें लगता है शायद हमसे ये नहीं होगा। और हम ऐंज़ाइयटी और डिप्रेशन का शिकार होते है। अगर हम सोचते है कि कुछ करें या ना करें बिलकुल वैसे ही जैसे अर्जुन, अग़र  युद्ध करते है तो पछतावा रहेगा कि अपने लोगों मारा अगर नहीं करते है जीवन भर खुद को माफ़ नहीं कर पाएँगे की उसने अपने डर की  वजह से वो अपने कर्तव्य से पीछे हट गए। 

हमारी परिस्थिति भी कुछ ऐसी ही होती है द्वन्द के वक्त हम हमारी भावनाओं और विचारों के अधीन हो  जातें है। अर्जुन वही सब अनुभव करते है,  जिसे एंड अवसाद और घबराहट बोलते है। 

इसको हम ऐसे भी देख सकते है हमारा जीवन कुरुक्षेत्र हैं और हम उसके अर्जुन है। और हमेशा हम अपने को ऐसे ही  कुरुक्षेत्र में खड़े पाते है। अब इसमें क्या करें यह अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण बताते है। हम में से बहुत सारे लोग इसी तरह पूरी ज़िंदगी निकाल देते है और डर में जीते रहते है । 

यह सुनकर धृतराष्ट्र जो उनके विरोध में थे भी आश्चर्यचकित होते है की अर्जुन जो इतना शूरवीर है ऐसे कैसे विचलित हो रहा और युद्ध ना करने को बोल रहा है ये वैसे ही है जब हमारे आस पास के लोग बोलते अरे ये इंसान ऐसा नही था ये कैसे हो गया हमने बहुत सारे लोगों देखा जो बहुत ही ऊर्जावान और पुरुषार्थ वाले लगते है, पर अचानक उन पर डर हावी हो जाता है और अपने कर्मों से दूर हो जाते है। जो कायरता का प्रमाण है और हम दूसरों के लिए हंसी और दया के पात्र बन जाते है।

और आप को जीवन मिला है तो जीवन रूपी कुरुक्षेत्र में आपको कर्म तो करना पड़ेगा अगर आप कर्म नहीं कर रहे तब भी आप कर्म कर रहे हैं। कर्म ना करना भी एक करम है, जो कायरता का प्रमाण है।जीवन एक कुरुक्षेत्र है आप उसके बीच में है आप सोचते है की आप करम से बच जाएंगे, नहीं बच सकते वैसे ही जैसे अगर जीवन है तो आपको साँस आती है आपकी पलके झपकती, आप से कर्म तो होगा उसपे आपका कोई नियंत्रण नहीं है। क्या कर्म करना है ये तो हमें निर्णय करना है। 

अब इसको अगर ऐसे देखे की की बहुत सारे शत्रु हमारे अंदर ही होते है हमारे विचार और भावनाएं, जिनसे हमारी लड़ाई चलती रहती है यही मन हमारा कुरुक्षेत्र है उनसे हमें प्रतिदिन लड़ना पड़ता है की ये करे या वो करें, ये करेंगे तो ये होगा वो करेंगे तो वो होगा, पर कर्म तो करना पड़ेगा, निर्णय तो लेना पड़ेगा उसके बिना ना आप आगे नहीं बढ़ सकते है। कर्म ना करना सबसे बड़ा पाप है और सारी लड़ाई आपके अंदर ही चलती और अगर वो जीत ली तो बाहर की भी सारी लड़ाई आप जीत लेंगे। 

भगवद गीता हमें यही सिखाती कैसे अपनी लड़ाई जीते और ये भी कह सकते है कि ये सबसे पुरानी मनोवैज्ञानिक  किताब है। 

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