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श्रीमद् भगवद गीता – अध्याय – ४ – अतुल वर्मा

कर्म तीन तरह के होते है कर्म, अकर्म और विकर्म। कर्म वो कार्य है जो हमारे शास्त्रों में बताए गए है और जो इंद्रियों और मन को शुद्ध करने वाले होते है।अकर्म वो कार्य है जो बिना किसी आसक्ति के और बिना कर्म फल की आशा के ईश्वर के लिए किए जाते है, और उनसे कोई कर्म बंधन नही होता है। विकर्म वो कर्म है जो शास्त्रों में माना किए गए है और जो आपकी आत्मा को पतन की ओर ले जाते हैं।

श्रीमद् भगवद गीता – अध्याय – २ – अतुल वर्मा

शांख्य योग दूसरे अध्याय में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को बताते है की कैसे आशंका, हताशा, डर मन को कमजोर करने वाले होते है और इसकी वजह …

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श्रीमद् भगवद गीता – अध्याय – १ – अतुल वर्मा

शत्रु हमारे अंदर ही होते है हमारे विचार और भावनाएं, जिनसे हमारी लड़ाई चलती रहती है यही मन हमारा कुरुक्षेत्र है उनसे हमें प्रतिदिन लड़ना पड़ता है की ये करे या वो करें, ये करेंगे तो ये होगा वो करेंगे तो वो होगा, पर कर्म तो करना पड़ेगा, निर्णय तो लेना पड़ेगा उसके बिना ना आप आगे नहीं बढ़ सकते है। कर्म ना करना सबसे बड़ा पाप है और सारी लड़ाई आपके अंदर ही चलती और अगर वो जीत ली तो बाहर की भी सारी लड़ाई आप जीत लेंगे।

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